॥ दोहा ॥
जय जय कैला भगवती, कला शक्ति अवतार ॥जन रंजन भंजन विपति, माता जगताधार ॥
- जय जय कैला मात भवानी । आदि शक्ति रूपा कल्याणी ॥
- रूप तुम्हरो अद्भुत अम्बा । जग पालक तुम हो जगदम्बा ॥
- तुम्हरी महिमा सब जग जानी । सूर-नर-मुनि सबने तुम मानी ॥
- कलयुग कला शक्ति अवतारी । त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी ॥
- तुमने दानव दैत्य पछारे । लोहासुर से पापी मारे ॥
- केदार गिरि तप कीन्ह अपारा । ता संग खेली चौपड़ सारा ॥
- भक्त बहोरा आज चराता । निश दिन मन में तुमको ध्याता ॥
- ताके अम्बे कारज सारे । भक्त शिरोमणि रख्यो द्वारे ॥
- भूत प्रेत की खोर हटाता । माँ की भक्ति तुरत दिलाता ॥
- नृप खींची पर दया दिखाई । सुत फांसी से लीन बचाई ॥
- तुम्हारौ नृप ने थान बनायौ । नित पूजन का नियम चलायो ॥
- ज्योति अखण्ड जली जब माँ की । चन्द्रसेन नृप देखी झाँकी ॥
- यदुवंशिन कुल पूज्य भवानी । समर विजय कर नृप ने जानी ॥
- चन्द्र वंश विस्तार बढ़ायो । माँ को सुन्दर भवन बनायो ॥
- पूजा कीन्ह गुसांई तुम्हारी । जग कीरति आपन विस्तारी ॥
- तुम ही अम्बे दुर्गे काली । वैष्णव देवी है विकराली ॥
- विंध्य-वासिनी दैत्य विदरनी । आदि शक्ति हे अरि दल दलनी ॥
- नव दुर्गा नित कला कराली । गिरि त्रिकूट माँ शेरावाली ॥
- चामुंडा संग आप विराजी । द्वारे नित प्रति नौबत बाजी ॥
- घंटन की ध्वनि होत अपारा । भक्त करत माँ का जयकारा ॥
- घुटअन लांगुर चालत भवन में । नांचत जोगिनि तेरे आंगन में ॥
- कलयुग कर कृपाण संभारी । करता मात धर्म की ख्वारी ॥
- आपन प्रभाव आन विस्तारो । माता तुम्हीं करो निस्तारो ॥
- खड्ग धारिणी भक्त उबारणी । माता जन के काज संवारिनी ॥
- कलयुग तुम्हीं एक अवलम्बा । क्यों करती हो मात विलम्बा ॥
- केहरि वाहन सजके आओ । कलि महिषा से आन छुड़ाओ ॥
- धूम्र विलोचन बाहु विशाला । रक्त बीज भव कीन विहाला ॥
- जगदम्बा बन मात पधारौ । निज जन को तुम आन उबारो ॥
- बनिक भक्त की नाव बचाई । मूल सिंह की लाज रखाई ॥
- भक्तन को सुख देत भवानी । कोढी काया बनी सुहानी ॥
- भक्तन को भक्ति की दाता । मनवांछित फल देती माता ॥
- माँ को मन्दिर है अति सुन्दर । ध्वजा पताका फहरे ऊपर ॥
- आगे लांगुर वीर विराजे । गौरी सुत की झांकी साजे ॥
- दुर्गेश्वर शिव औघड़ दानी । रहते तुम्हारे साथ भवानी ॥
- सूखा बांस हरा कर डारा । पत्थर से प्रकटी जलधारा ॥
- काली सिल तेहि नाम कहाता । जो जन प्रेम से आनि नहाता ॥
- ध्वजा नारियल पान सुपारी । माँ के रखते आनि अगारी ॥
- इच्छा माता पूरी करती । गोदी खाली माता भरती ॥
- नित प्रति चालीसा जो है पढ़ता । भव सागर में फिर ना पड़ता ॥
- कृपा मूढ पर कर महारानी । खड़ो द्वार जोडूं दोऊ पाणी ॥
॥ दोहा ॥
जग जननी मातेश्वरी, पुनि पुनि जोडु हाथ ।चालीसा पुरण करो, मूल मनोरथ साथ ॥
जय कैला माता की